Thursday, 31 July 2014

आग जिन्दा रखने को चिंगारी जरुरी हैं.....

ये संगदिली बेरहमी मेरी मज़बूरी हैं
आग जिन्दा रखने को चिंगारी जरुरी हैं

एक रोज़ पत्थर पिघलेगे सितारे बरसेगे
रुखसार मेरा बेरंग सही हलक कस्तूरी हैं

उन्ही का निकाह झूठा निबाह फरेबी हैं
जिनकी आंखे सच्ची माथा सिंदूरी हैं

अल्लाह कैसी मेरी मज़बूरी हैं
उसकी जुबा कटारी आंखे बहुत अंगूरी हैं

बस एक आह मिरी कदम तेरे लौट जायेगे
आज भी अपने बीच फ़कद इतनी दूरी हैं

तुम मुझे मिले नही गले कोई क्या लगे
ईदी मुझे मिली नही ईद मेरी अधूरी हैं

जो भी था कभी,धीरे धीरे जाया हुआ
कहना सुनाना तो जफ़र बस दस्तूरी हैं


एक दिन वो पूछेगे एक दिन वो समझ जायेगे .

यादो में चुपके से हमको गुनगुनाएगे ,
एक दिन वो पूछेगे एक दिन वो समझ जायेगे .

प्यार तो बस प्यार हैं ,बेमानी हैं सब तकरीरे ,
तुम हारो ना हारो हम जीत ही जायेगे ..
.
दिल जब घबरायेगा,रंग चेहरे का उड़ जायेगा ,
आह भर कर मेरी तश्वीर से लिपट जायेगे ..

संग दिली में काट तो दो तुम आस की हर डाल को,
उम्मीद के पंछी फिर भी, मगर घोंसला बनायेगे .

सारी गर्मी की छुट्टी जिसने हसाया सुबह शाम ,
लौटते वक्त वही जी भरके रुलायेगे .

Wednesday, 30 July 2014

आओ फिर बारिशो में खेले

आओ फिर बारिशो में खेले
बिजलियो से आँखे मिलाये
एक बार सबकुछ भूल जाये....
मौसम ये नशीला बड़ा हैं
कबसे अपने पीछे पड़ा हैं
उतारो ये शिकवो शिकायतों के चेहरे
तोड़ कर सारे पहरे
दरवाजों से ये जाले हटाये.....

हमने ये कैसे जिस्म पहन लिए
कभी जो बाहों में आकर ही
सब भूल जाते थे
हमारी ही बाते दुहराते थे
आज मनाये नही मानते
चलो इन फरेबी दिलो को
कुछ कुछ याद दिलाये.......


Saturday, 26 July 2014

ख्वाब हमारे कच्चे हैं नीद हमारी आधी हैं..........

ख्वाब हमारे कच्चे हैं नीद हमारी आधी हैं
में भी तुम भी जाना हालातो के अपराधी हैं
किस घडी में हमने तकदीरे लिखवाई थी
इस नुक्कड़ पे मौत हैं उस गली में बर्बादी हैं
ये दुनिया  तो एक मृत तर्षाना हैं प्यारे,
दुःख  बस अपने,खुशिया सारी मियादी हैं
एक हैं आंसू अपने एक से अफ़साने हैं
मैं भी तुम भी सारे एक डगर के साथी हैं
तू अधूरी मैं अधुरा एकदूजे बिन हैं
साथ हमारा जैसे दिया और बाती हैं
कितने बिछुड़े कितने तूफा हमने देखे हैं
आंख हमारी पत्थर जिगर बड़े फौलादी हैं



Wednesday, 23 July 2014

एक ही ठोकर को हम उम्र भर सँभालते रहे

दोस्त बन बन के लोग दुश्मनी निकालते रहे
एक ही ठोकर को हम उम्र भर सँभालते रहे

 गोया बार बार हम भी कोशिशे करते रहे
वो भी माशाल्लाह बारहा गलतिया निकलते रहे
कोई जोहरी की सी नज़र से हमे देखेगा
कई सदिया हम ये हसीन ख्वाब पालते रहे
लोग अंधेरो में तारीख लिख के चल दिए
हम धीमी आंच पे अपने चावल उबालते रहे
फसले हमारे गाँव की सब शहर चली गयी
लोग खाली पेट ज़मीन की कमिया निकालते रहे

Sunday, 20 July 2014

तुम पनाह न देते किधर गया होता

दर्द में डूब कर बिखर गया होता
तुम पनाह न देते किधर गया होता
तेरे आखिरी मेसेज ने रोक ली साँसे
सूरत पे यकी करता तो मर गया होता
मुज़बुरिया क्या हैं पता चल जाता
तू एक बार जो मेरे हालात से गुज़र गया होता
हर बार वही फरेब हैं मिरे नसीब में
गोया कोई तजुर्बा तो मुख़्तसर गया होता

Thursday, 17 July 2014

पलकों में दबा कर एक आंसुओ का सैलाब रखा हैं

पलकों में दबा कर एक आंसुओ का सैलाब रखा हैं
दुनिया से बचा कर अबतक तेरा ख्वाब रखा हैं
आहिस्ता आहिस्ता ही समझ में आयुंगा
अपनी शख्शियत पे बड़ा मेहराब रखा हैं
हमने मोहब्बत भी बे इन्तहा की थी
जबके उन्होंने नफरतो का भी हिसाब रखा हैं
घर से निकल कर जाऊ भी तो किस तरफ
हर तरफ जफ़र महज़बी फसाद रखा हैं
हमने उनके जुल्म भी भुला दिए
उन्होंने हमारी नादानी को भी याद रखा हैं
लौट के शहर से ग़ाव जाने से डरता हूँ
भाइयो ने आगन को इतना बाट रखा हैं