Wednesday, 13 August 2014

सारा समुंदर भी पी सकता हू मुझे प्यास इतनी हैं.....

मत पूछ इस बेक़रार दिल को तेरी तलाश कितनी हैं,
सारा समुंदर भी पी सकता हू मुझे प्यास इतनी हैं

कितनी आँखों से सपने कितने मुह से निवाला छिना हैं
आज के दौर में दोस्त दुनिया बदहवास कितनी हैं

जिस चीड़ की छाल पर खुरोच कर लिखा था तुमने नाम
पूछता हैं कि तू तो परेशा हैं वो बिछड़कर उदास कितनी हैं

हरेक राह में वही मंजिल वही साथी तलाशता हैं
तेरी सोहबत तेरी चाहत इसको खास कितनी हैं

इन दंगो में हमने चोटे गहरी दिलो में खायी हैं
सियासत गिनती हैं शहर में बस लाश कितनी हैं

तेरी तशवीर जड़ा लोकेट गले से बांध लिया हैं
नादाँ समझता हैं तू धडकनों के पास कितनी हैं

देर रात तक जागना,गज़ले कहना,देर सुबेरे उठाना
गोया शहर में चंद लोगो की जिन्दगी बर्बाद कितनी हैं


Thursday, 7 August 2014

दुनिया के सवालो में फस गया जफ़र किस कदर.....

बहुत करली सुबह शाम वही रोज की जद्दोजहद,
दुनिया के सवालो में फस गया जफ़र किस कदर

ये कौन सी कालिख गोया तक़दीर पर अमादा हैं,
कितना खपाऊ सर,फिर भी हाथ मेरे खाली फ़कद

यू तो तम्मनाओ का होता रहा हैं क़त्ल बारहा
अबकी बार साहिब मगर उसने करदी हद,

तेरे बाद रोज ही पिया किया मैंने जहर
बस एक बार जो तुम होठ पे रख गये शहद

निचोड़ कर सारा रस तो में पी ही गया
क्या करोगे लेके वापिस तुम अपने ख़त

ये चुभन ये घुटन ही हकीक़त हैं और क्या
ख्वाब तो हमने भी हसी देखे थे बहुत

रात भर इन अंधेरो को जफ़र सुनाता रहा दास्ता
इनके आंसू पत्तियों से ओस बन गिर रहे अब तलक....