Saturday, 28 March 2015

तेरी तश्वीर आँखों से नही उतारी ....

ज़माने की जिलालत  से हिम्मत नहीं हारी,
अब तक तेरी तस्वीर आँखों से नही उतारी


वो लोग और थे  जो दम तोड़ चुके हैं,
जीने की खिलाफत में जंग अब भी हैं जारी,

तुम हो की  ऊपर की हसी देख रहे हो,
दुनिया में तो हर फूल पर जुल्म हैं भारी,

उस एक मुलाकात  फल भोग रहा हूँ ,
तेरी यादें सीने में खिलती हुई फुलवारी ,

आप कभी खिदमद की ख़्वाहिश तो कीजिये,
कदमो में बिछा दूंगा में दौलत सारी ,

जैसे ही बेरहम गाड़ी ने स्टेशन छोड़ा,
काजल  भीगा गयी एक आँख कुवारी,

जी मार के जीना मैं भी सीख हूँ,
घुट घुट के मरी हैं कई उम्मीद बेचारी,

तेरा ख्याल करके कलम चलायी हैं,
कुछ अदावते मैंने कभी नही उतारी,

Friday, 20 March 2015

आखिर मुझमे मेरा क्या हैं...

आखिर मुझमे मेरा क्या हैं,
तुम लोगो की रश्मो रिवाजो
घुटन की जंजीरो में,
कशमकश की जद्दो जहद में
हाथो की खाली लकीरो में
ये करो ये ना करो की तकरीरों में
इन तशविरो में ताबिजो में
तुमने मेरा छोड़ा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं....

थोडा थोडा रोज़ कटता जाता हूँ
तुम्हारे मुताबिक बटता जाता हूँ
कैसी ओड़ी मज़बूरी हैं
बेचैन खुद,दुनिया में घुलती कस्तूरी हैं
बामुश्किल हैं बाधा खुदको
तुम्हारे ताबूतों में नापा खुदको
तुम्हारी सुनी तुम्हारी करी
मर गया हैं मुझमे मैं ही
तुमने ही ये जहर पिलाया,
पहरो में आवाज़ों को दबाया
फिर रोना धोना झूठ बनावटी घेरा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं......

मुझको मैं ही बनने देते,
गिरने देते लड़ने देते
ठोकरों  की चक्की में छनने देते
मुझको यु न बाधा होता,
पा लेता जो कुछ पाना होता
मंजिले सब अपनी बनांते,
परिंदे आसमानों में बेख़ौफ़ उड़ पाते
तुमने पिंजरा जो खोला होता
कफ़स ने अब जिन्दा छोड़ा क्या हैं
आखिर मुझमे मेरा क्या हैं......

Friday, 13 March 2015

मेरी निगाह को तेरा इंतज़ार अब तक हैं …

धड़कनो में दबा  हुआ सा गुबार अब तक हैं,
मेरी निगाह को तेरा इंतज़ार अब तक हैं  . 

गैर की बाहो में भी तुम मुझे भुला नही सकते ,
सदाओं में कशिश को वो धार  अब तक हैं  

एक रोज़ छुआ था दौरे तनहाई में,
बदन में खुशबु ए यार अब तक हैं 

यु ही मिल जाएगी तू किसी रोज़ उसी रोड पर,
नादान दिल को ये एतबार अब तक हैं 

जीता हूँ दुनिया के कई इम्तहानों में ,
गोया उस हार से हार अब तक हैं  . 

मुझसे पहले जो चोट खाये बैठे थे,
उनको जफ़र बुतो से करार अब तक हैं  ……। 

Sunday, 8 March 2015

मेरा इश्क़ तेरी बंदगी से बड़के हैं


मेरा इश्क़ तेरी बंदगी से बड़के हैं
जैसे राधा का रिश्ता रुक्मणी से बड़के हैं

मूर्छित हुआ जिसने प्रेम का अपमान किया
लछमन का क्रोध कब श्रद्धा सबरी से बड़के हैं

मेरे लबो से मिश्री अबतक घुली नही
अल्लाह उसके होठ चासनी से बड़के हैं

तेरे रुखसार पर एक बेचैनी तराशता देती हैंँ
मेरी नज़र भी जोहरी से बड़के है

तेरे शहर की रौनक शामें तु ही संभाल
मेरे खेत का कलेवा तेरी दाल मखनी से बड़के हैं


Wednesday, 4 March 2015

गले से लगा मगर आँख से उतर गया. .....

गले से लगा मगर आँख से उतर गया
तेरा एक फैसला कितने फासले कर गया

बात वो बात अब शायद कभी न हो
जहर तो जानेमन उमरभर को घुल गया

तू मेरा फक्र मेरा गुरुर था मेरे हमसफ़र
देखा जो तेरे हौसले मैँ डर गया

कुछ परिंदे कभी लौट कर नही आये,
दूध सी ज़िन्दगी में,एक बूद जो खट्टा पड़ गया

घर का वीराना उसे तलाश करता हैं
पायलों को झनझन में सन्नाटे जो भर गया

दफ्तरो में ताले लगे हैं रास्ते सुनसान हैं
सुना हैं कल कोई इंसानियत का क़त्ल कर गया