Saturday, 28 March 2015

तेरी तश्वीर आँखों से नही उतारी ....

ज़माने की जिलालत  से हिम्मत नहीं हारी,
अब तक तेरी तस्वीर आँखों से नही उतारी


वो लोग और थे  जो दम तोड़ चुके हैं,
जीने की खिलाफत में जंग अब भी हैं जारी,

तुम हो की  ऊपर की हसी देख रहे हो,
दुनिया में तो हर फूल पर जुल्म हैं भारी,

उस एक मुलाकात  फल भोग रहा हूँ ,
तेरी यादें सीने में खिलती हुई फुलवारी ,

आप कभी खिदमद की ख़्वाहिश तो कीजिये,
कदमो में बिछा दूंगा में दौलत सारी ,

जैसे ही बेरहम गाड़ी ने स्टेशन छोड़ा,
काजल  भीगा गयी एक आँख कुवारी,

जी मार के जीना मैं भी सीख हूँ,
घुट घुट के मरी हैं कई उम्मीद बेचारी,

तेरा ख्याल करके कलम चलायी हैं,
कुछ अदावते मैंने कभी नही उतारी,

10 comments:

  1. आप कभी खिदमद की ख़्वाहिश तो कीजिये,
    कदमो में बिछा दूंगा में दौलत सारी ,
    आशिक के दिल से निकली बात है ये शेर ... बहुत लाजवाब कलाम है ...

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  2. ग़ज़ल अच्छी है. तश्वीर से आपका अभिप्राय 'तस्वीर' रहा होगा ऐसा प्रतीत होता है.

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    1. धन्यवाद् रंजन जी..

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  3. बहुत ही शानदार गज़ल।

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  4. जैसे ही बेरहम गाड़ी ने स्टेशन छोड़ा,
    काजल भीगा गयी एक आँख कुवारी,

    वाह बहुत खूब

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  5. तुम हो की ऊपर की हसी देख रहे हो,
    दुनिया में तो हर फूल पर जुल्म हैं भारी,

    वाह बहुत खूबसूरत।

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  6. वो लोग और थे जो दम तोड़ चुके हैं,
    जीने की खिलाफत में जंग अब भी हैं जारी,
    बहुत सुंदर पंक्तियाँ.
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  7. बहुत सुन्दर ,
    मंगलकामनाएं आपको !

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  8. My sincere thanks you all for kind appreciation..

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  9. तुम हो की ऊपर की हसी देख रहे हो,
    दुनिया में तो हर फूल पर जुल्म हैं भारी,

    .... बहुत खूबसूरत।

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